अमेरिका की लगातार पांच रातों की बमबारी असल में उसकी रणनीतिक लाचारी का सबूत है

अमेरिका की लगातार पांच रातों की बमबारी असल में उसकी रणनीतिक लाचारी का सबूत है

मुख्यधारा का मीडिया फिर से वही पुराना राग अलाप रहा है। "अमेरिका ने फिर किया हमला।" "ईरान समर्थित ठिकानों पर बमबारी।" हेडलाइंस चिल्ला-चिल्ला कर कह रही हैं कि वाशिंगटन अपनी सैन्य ताकत का प्रदर्शन कर रहा है। लेकिन जो लोग दशकों से मध्य पूर्व के सुरक्षा तंत्र को करीब से देख रहे हैं, वे इस नाटक के पीछे की असलियत जानते हैं।

यह कोई ताकत का प्रदर्शन नहीं है। यह एक खतरनाक और थका देने वाली रणनीतिक लाचारी का सबूत है। लगातार पांच रातों तक मिसाइलें दागना यह साबित नहीं करता कि आप जीत रहे हैं; यह सिर्फ यह साबित करता है कि आपके पहले चार दिनों के हमले पूरी तरह से बेअसर रहे।


जब बमबारी केवल एक पीआर स्टंट बन जाए

ग्लोबल मीडिया आपको विश्वास दिलाना चाहता है कि इन हवाई हमलों से ईरान सहम गया है। सच इससे बिल्कुल उलट है। पेंटागन के पास इस समय कोई दीर्घकालिक रणनीति नहीं है। वे केवल राजनीतिक दबाव के तहत काम कर रहे हैं। जब भी कोई अमेरिकी सैनिक घायल होता है या लाल सागर में जहाजों पर हमले होते हैं, तो अमेरिकी राष्ट्रपति को घरेलू राजनीति में "मजबूत" दिखने के लिए कुछ न कुछ बम गिराने पड़ते हैं।

सैन्य इतिहास गवाह है कि केवल हवाई हमलों से कभी किसी कड़े इरादे वाले दुश्मन को घुटनों पर नहीं लाया जा सका।

  • 1999 का कोसोवो युद्ध: हफ्तों की बमबारी के बाद भी जमीनी सेना के बिना नतीजा नहीं निकला।
  • सऊदी अरब का यमन अभियान: सऊदी ने सालों तक यमन पर आधुनिक हथियारों से बम बरसाए, लेकिन हूती आज भी पहले से अधिक मजबूत हैं।

यही खेल आज भी खेला जा रहा है। ये हमले सैन्य लक्ष्यों को तबाह करने के लिए नहीं, बल्कि वाशिंगटन में बैठे नीति निर्माताओं के चेहरों को बचाने के लिए किए जा रहे हैं।


प्रॉक्सी वॉर का गणित: ईरान क्यों मुस्कुरा रहा है?

ईरान के रणनीतिकार बेवकूफ नहीं हैं। उन्होंने दशकों लगाकर एक ऐसा नेटवर्क तैयार किया है जिसे पारंपरिक सैन्य हमलों से नष्ट नहीं किया जा सकता। इसे 'एक्सिस ऑफ रेसिस्टेंस' कहा जाता है।

इस नेटवर्क की सबसे बड़ी खासियत इसका विकेंद्रीकरण है।

1. सस्ते ड्रोन बनाम महंगे इंटरसेप्टर

एक हूती ड्रोन की कीमत मुश्किल से $10,000 से $20,000 होती है। वहीं, अमेरिका इसे मार गिराने के लिए $2 मिलियन की पैट्रियट या एसएम-2 मिसाइल का इस्तेमाल करता है। इस आर्थिक गणित में अमेरिका हर रात हार रहा है।

2. कोई स्थायी ठिकाना नहीं

अमेरिकी सेना जिन ठिकानों पर बमबारी कर रही है, वे कोई बड़े सैन्य अड्डे नहीं हैं। ये मोबाइल लॉन्चर, कंक्रीट के छोटे बंकर और सुरंगें हैं। जैसे ही अमेरिकी फाइटर जेट उड़ान भरते हैं, खुफिया जानकारी लीक हो जाती है और लड़ाके वहां से हट जाते हैं। अमेरिका केवल खाली इमारतों और मलबे पर लाखों डॉलर की मिसाइलें गिरा रहा है।

3. शहादत की राजनीति

इस क्षेत्र में काम करने वाले समूहों के लिए अमेरिकी हमला कोई आपदा नहीं, बल्कि उनके लिए सबसे बड़ा भर्ती अभियान है। हर अमेरिकी हमला स्थानीय आबादी में उनके प्रति समर्थन को और मजबूत करता है।


वह भ्रम जो न्यूज़ चैनल आपको बेच रहे हैं

गंभीरता से सोचिए। क्या वाकई ईरान में सीधे धमाके हो रहे हैं जैसा कि कुछ मीडिया घराने दावा कर रहे हैं? बिल्कुल नहीं। अमेरिका सीधे ईरानी धरती पर हमला करने की हिम्मत कभी नहीं करेगा। वह केवल सीरिया, इराक और यमन में ईरान के सहयोगियों को निशाना बना रहा है।

यह एक नूराकुश्ती है। दोनों पक्षों को इस खेल के नियम पता हैं:

"तुम हमारे सहयोगियों पर कुछ बम गिराओ, हम पलटवार में कुछ रॉकेट दागेंगे। लेकिन कोई भी रेड लाइन पार नहीं करेगा।"

यह एक नियंत्रित तनाव है। अमेरिका जानता है कि अगर उसने सीधे ईरान पर हमला किया, तो पूरा मध्य पूर्व जल उठेगा। तेल की कीमतें $150 प्रति बैरल को पार कर जाएंगी, जिससे वैश्विक अर्थव्यवस्था तबाह हो जाएगी। इसलिए, यह पांच रातों की बमबारी केवल एक छलावा है ताकि दुनिया को लगे कि अमेरिका कुछ कर रहा है।


रणनीतिक कंगाली का असली चेहरा

मैंने सालों तक रक्षा बजट और सैन्य रणनीतियों का विश्लेषण किया है। जब कोई सेना बार-बार एक ही असफल तरीके को दोहराती है, तो उसे रणनीति नहीं, बल्कि हताशा कहते हैं।

अमेरिका की इस नीति के तीन बड़े नुकसान हैं जो उसकी खुद की सुरक्षा को खतरे में डाल रहे हैं:

हथियारों के भंडार का खाली होना

यूक्रेन युद्ध ने पहले ही पश्चिमी देशों के गोला-बारूद के भंडार को खाली कर दिया है। अब मध्य पूर्व में हर रात लाखों डॉलर के हथियारों को बर्बाद करना अमेरिकी सेना के लिए आत्मघाती साबित हो रहा है। यदि आने वाले समय में ताइवान जलडमरूमध्य में कोई वास्तविक संकट पैदा होता है, तो अमेरिका के पास अपनी रक्षा के लिए पर्याप्त उन्नत मिसाइलें भी नहीं बचेंगी।

अमेरिकी साख को बट्टा

जब आप लगातार पांच रातों तक दुनिया के सबसे ताकतवर हथियारों से हमला करते हैं और फिर भी छठे दिन दुश्मन आपके जहाजों पर मिसाइल दाग देता है, तो पूरी दुनिया आपकी कमजोरी को देख लेती है। इस सैन्य कार्रवाई ने अमेरिकी महाशक्ति की धाक को बढ़ाने के बजाय उसे पूरी तरह से उजागर कर दिया है।

चीन और रूस को सीधा फायदा

जब अमेरिका मध्य पूर्व के इस दलदल में खुद को फंसाए रखता है, तो बीजिंग और मॉस्को में बैठे रणनीतिकार जश्न मनाते हैं। अमेरिका अपनी पूरी ऊर्जा और संसाधन एक ऐसे मोर्चे पर लगा रहा है जिसका कोई रणनीतिक अंत नहीं है, जिससे उसके मुख्य वैश्विक प्रतिद्वंद्वियों को खुली छूट मिल रही है।


इस अंतहीन चक्र को तोड़ने का एकमात्र तरीका

यदि अमेरिका सचमुच इस संकट को हल करना चाहता है, तो उसे बम गिराना बंद करना होगा और जमीनी सच्चाई को स्वीकार करना होगा। मध्य पूर्व में स्थिरता स्थापित करने का रास्ता मिसाइलों से नहीं, बल्कि कूटनीति की मेज से होकर जाता है।

जब तक वाशिंगटन इस क्षेत्र के मूल मुद्दों, जैसे कि इजरायल-फिलिस्तीन संघर्ष और ईरान के साथ एक व्यावहारिक सुरक्षा समझौते पर बात नहीं करता, तब तक यह हवाई हमले केवल एक अस्थाई और महंगे बैंड-एड की तरह काम करेंगे जो एक गहरे घाव को छिपाने की कोशिश कर रहा है।

अगली बार जब आप टीवी पर अमेरिकी हमलों के चमकीले वीडियो देखें, तो खुद से पूछें: क्या इस पांचवीं रात के धमाके से दुनिया वाकई सुरक्षित हुई है, या हम केवल एक और लंबे, बेनतीजा युद्ध की ओर बढ़ रहे हैं? जवाब आपके सामने है।

HB

Hannah Brooks

Hannah Brooks is passionate about using journalism as a tool for positive change, focusing on stories that matter to communities and society.